मध्य पूर्व में एक तरफ़ इसराइल और मुस्लिम देशों का टकराव है तो दूसरी तरफ़ शिया बहुल ईरान और सुन्नी बहुल सऊदी अरब की भी दुश्मनी है.इसी दुश्मनी की बुनियाद पर कहा है जा रहा है कि इसराइल और सऊदी अरब के बीच दोस्ती बढ़ रही है.

इधर के सालों में सऊदी अरब और ईरान के बीच दुश्मनी बढ़ी है. यमन इन दोनों देशों के लिए युद्ध का मैदान बना हुआ है. यमन में सऊदी की नेतृत्व वाली सेना है और दूसरी तरफ़ हूथी विद्रोही हैं.

ईरान पर आरोप है कि वो यमन में हूथी विद्रोहियों की मदद कर रहा है.क्या दोनों देश यमन से आगे बढ़ ख़ुद सीधे तौर पर भविष्य में आमने-सामने होंगे? अगर ऐसा होता है तो जीत किसकी होगी?

ज़ाहिर है जीत केवल अपनी सैन्य शक्ति पर निर्भर नहीं करती है बल्कि दुनिया के शक्तिशाली देश किस पाले में हैं ये ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं. इस मामले में भी दुनिया की ताक़तें बंटी हुई हैं. जहां दुनिया के सबसे ताक़तवर देश अमरीका सऊदी के साथ है तो रूस ईरान के साथ.

सीरिया में अमरीकी नेतृत्व वाले खेमे की हार और रूसी खेमे वाली सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद की सेना की जीत के बाद मध्य-पूर्व में शक्ति का स्वरूप बदला है. अमरीका और सऊदी बशर अल-असद को हटाने में लगे रहे लेकिन रूस और ईरान इन पर भारी पड़े.

ऐसे में सवाल उठता है कि युद्ध के मैदान में सऊदी पर ईरान भारी पड़ेगा या ईरान पर सऊदी? इसे हम दोनों देशों की सैन्य सामर्थ्य के आधार पर भी समझ सकते हैं.

वही दूसरी तरफ टर्की ने मुस्लिम देशों के टकराव को रोकने के लिए कई कोशिशें की है लगातार टर्की सऊदी और इज़राइल की दोस्ती को मतलब की दोस्ती बताता आया है टर्की के बार सऊदी को आगाह करचुक है कि वो इज़रायल पर ज़्यादा भरोसा न करे ।