क़तर की ओपेक से निकलने की घोषणा को जहां एक प्रतिकात्मक क़दम माना जा रहा है, वहीं दोहा का यह फ़ैसला तेल उत्पादक देशों के इस संगठन के लिए कोई अच्छा शगून नहीं है। क़तर इस संगठन का एक संस्थापक सदस्य देश है।

ब्रिटेन स्थित अल्फ़ा इनर्जी के चेयरमैन जॉन हाल का कहना है कि क़तर ने सऊदी अरब और उसके सहयोगियों द्वारा घेराबंदी के जवाब में यह क़दम उठाया है और इससे सऊदी अरब और ओपेक दोनों की विश्वसनीयता को नुक़सान पुहंचेगा।

वरिष्ठ अर्थशास्त्री जेसन तुवे का कहना है कि क़तर ने यह क़दम सऊदी अरब और उसके सहयोगियों से विवाद के चलते उठाया है।

ऊर्जा मामलों की विशेषज्ञ एमी मायर्स जैफ़ का इस संबंध में कहना है कि सऊदी अरब और उसके सहयोगियों की घेराबंदी से क़तर को समस्याओं का सामना ज़रूर करना पड़ा है, लेकिन अब वह सऊदी अरब के दबाव से आज़ाद है और अपने तेल और गैस को अंतरराष्ट्रीय मार्केट में अपने हितों के अनुसार पेश कर सकता है।

जैफ़ का यह भी कहना था कि अगर इसी तरह से ओपेक से दूसरे सदस्य भी निकलने का फ़ैसला करते रहे तो निश्चित रूप से ओपेक का प्रभाव कम हो जाएगा।